सामाजिक समूह : प्राथमिक, द्वितीयक एवं सन्दर्भ समूह

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। परिवार, मित्र, विद्यालय, कार्यस्थल और अन्य सामाजिक समूह हमारे व्यवहार, व्यक्तित्व और सामाजिक जीवन को प्रभावित करते हैं। सामाजिक समूहों के विभिन्न प्रकारों को समझना समाज और व्यक्ति के संबंध को समझने के लिए आवश्यक है।

सामाजिक समूह : प्राथमिक, द्वितीयक एवं सन्दर्भ समूह मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेले जीवन नहीं जी सकता, बल्कि परिवार, मित्रों, पड़ोस, विद्यालय, कार्यस्थल तथा अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ जुड़कर अपना जीवन व्यतीत करता है। व्यक्तियों के बीच स्थापित सामाजिक संबंधों और पारस्परिक अंतःक्रियाओं से सामाजिक समूह का निर्माण होता है। सामाजिक समूह व्यक्ति के व्यवहार, व्यक्तित्व, विचारों और सामाजिक जीवन को प्रभावित करते हैं। !Article image/api/blog/covers/1789096843499-f57dc0c0df74bb10bdc39f8a83294781.png सामाजिक समूह का अर्थ सामाजिक समूह दो या दो से अधिक व्यक्तियों का ऐसा समूह है, जिसके सदस्यों के बीच सामाजिक संबंध और पारस्परिक अंतःक्रिया होती है। समूह के सदस्यों में एक-दूसरे के प्रति जागरूकता, सहयोग तथा सामूहिक भावना पाई जाती है। परिवार, मित्रों का समूह, विद्यालय, धार्मिक संगठन, राजनीतिक दल तथा श्रमिक संगठन इसके उदाहरण हैं। सामाजिक समूह केवल व्यक्तियों की भीड़ नहीं है। भीड़ में लोग एक स्थान पर उपस्थित हो सकते हैं, लेकिन उनके बीच आवश्यक रूप से स्थायी सामाजिक संबंध या सामूहिक भावना नहीं होती। समूह में सदस्यों के बीच संबंध, उद्देश्य, नियम और परस्पर सहयोग पाया जाता है। सामाजिक समूह की प्रमुख विशेषताएँ सामाजिक समूह की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं— व्यक्तियों का समूह – समूह के निर्माण के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना आवश्यक है। सामाजिक संबंध – सदस्यों के बीच पारस्परिक सामाजिक संबंध होते हैं। सामान्य रुचि – समूह के सदस्यों में किसी सामान्य उद्देश्य या रुचि की भावना हो सकती है। एकता की भावना – सदस्यों में ‘हम’ की भावना समूह को मजबूत बनाती है। सामूहिक आदर्श – समूह में कुछ सामान्य नियम, मूल्य और आदर्श होते हैं। सदस्यता – व्यक्ति अपनी आवश्यकता, रुचि या उद्देश्य के अनुसार विभिन्न समूहों का सदस्य बनता है। सामाजिक नियंत्रण – समूह अपने सदस्यों के व्यवहार को प्रभावित और नियंत्रित करता है। प्राथमिक समूह प्राथमिक समूह वह समूह है जिसमें सदस्यों के बीच घनिष्ठ, प्रत्यक्ष और भावनात्मक संबंध होते हैं। परिवार इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। मित्रों का छोटा समूह और पड़ोस के घनिष्ठ संबंध भी प्राथमिक समूह के उदाहरण हो सकते हैं। प्राथमिक समूह व्यक्ति के व्यक्तित्व और सामाजिक व्यवहार के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बच्चे परिवार से प्रेम, सहयोग, अनुशासन, नैतिक मूल्य और सामाजिक व्यवहार सीखते हैं। द्वितीयक समूह द्वितीयक समूह अपेक्षाकृत बड़ा और औपचारिक होता है। इसमें सदस्यों के संबंध मुख्यतः किसी विशेष उद्देश्य या कार्य की पूर्ति के लिए स्थापित होते हैं। विद्यालय, कार्यालय, राजनीतिक संगठन, व्यापारिक संस्था तथा श्रमिक संगठन इसके उदाहरण हैं। इन समूहों में व्यक्तिगत और भावनात्मक संबंधों की अपेक्षा कार्य, नियम और उद्देश्य अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। व्यक्ति किसी विशेष कार्य या लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ऐसे समूहों का सदस्य बनता है। सन्दर्भ समूह सन्दर्भ समूह वह समूह है जिसके मूल्यों, आदर्शों, व्यवहारों या जीवन-शैली को व्यक्ति अपने व्यवहार के लिए आदर्श या मापदंड के रूप में स्वीकार करता है। व्यक्ति किसी समूह का सदस्य हो भी सकता है और नहीं भी, फिर भी वह उस समूह से प्रभावित हो सकता है। उदाहरण के लिए, कोई विद्यार्थी किसी सफल वैज्ञानिक, खिलाड़ी या विद्वान को अपना आदर्श मानकर उसके विचारों और व्यवहार से प्रेरणा ले सकता है। इस प्रकार सन्दर्भ समूह व्यक्ति के विचारों, आकांक्षाओं और व्यवहार को प्रभावित करता है। निष्कर्ष सामाजिक समूह मानव जीवन का अभिन्न अंग हैं। प्राथमिक समूह व्यक्ति को भावनात्मक सुरक्षा और सामाजिक संस्कार प्रदान करते हैं, जबकि द्वितीयक समूह विशेष उद्देश्यों और कार्यों की पूर्ति में सहायता करते हैं। सन्दर्भ समूह व्यक्ति के आदर्शों, विचारों और व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार सामाजिक समूह व्यक्ति और समाज के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करते हैं। व्यक्ति समाज का निर्माण करता है और सामाजिक समूह व्यक्ति के व्यक्तित्व तथा सामाजिक जीवन को आकार देते हैं।

Author: Pahalwan singh